कागज के किरचों की तरह
कभी कभी
बिखरता है मन
उड़ता जाता है
कितनी ही ऊंचाइयों को
छूता जाता है
हवा की लहरों के संग
कितने ही सँकरे
तीखे मोड़ों से गुज़र कर
टुकड़ा टुकड़ा टकरा कर आपस मे
छू लेता है ज़मीन को
थक हार कर
बेबस मन...
कागज के किरचों की तरह!
ज़िन्दगी
कुछ लोगों के लिए
हसीं किताब होती है
और कुछ लोग
पलटते रहते हैं
काले स्याह पन्नों को
क्योंकि
सच की कालिख
हसीं किताब होती है
और कुछ लोग
पलटते रहते हैं
काले स्याह पन्नों को
क्योंकि
सच की कालिख
कभी मिटती नहीं है !
हंसाती कम, रूलाती ज्यादा है ज़िन्दगी
टूटे कांच के ढेर पर, ठौर सजाती है ज़िन्दगी
ज़िन्दगी हसीं किताब है, जिसके हर हर्फ़ में शिकवे हैं
पल भर में अर्श को,सिफर बना देती है जिंदगी
क्या कहूँ कि इतना नादाँ भी नहीं हूँ मैं
समझा यही फलसफा कि बेवफा है ज़िन्दगी
