वह तरलता है हृदय में, किरण को भी लौ बना दूँ ,
झाँक ले यदि एक तारा, तो उसे मैं सौ बना दूँ !
मार्ग से परिचय नहीं है, किन्तु परिचित शक्ति तो है,
दूर हो आराध्य चाहे, प्राण में अनुरक्ति तो है !!
झाँक ले यदि एक तारा, तो उसे मैं सौ बना दूँ !
मार्ग से परिचय नहीं है, किन्तु परिचित शक्ति तो है,
दूर हो आराध्य चाहे, प्राण में अनुरक्ति तो है !!
लेकिन मन में ये बात हमेशा चुभती रहती है, इसीलिए मेरी यह ब्लॉग लिखनेकी "पहल" कुछ कह जाती है .....
ये भी गुज़र जाएगा!
एक दौर ही तो है!
नहीं ठिकाना ये तेरा!
पल-दो-पल का ठौर ही तो है!
पा जाएगा एक दिन जवाब!
सवालों का शोर ही तो है!
कुछ देर में खुद होगा मद्धम!
तूफां का ज़ोर ही तो है!
तू ही बता! क्या नहीं पता?
हर रात का अंजाम भोर ही तो है!
उगते सूरज का इशारा!
तेरी ओर ही तो है!
इसलिए,
इसलिए,
ज़रा हिम्मत कर, उम्मीद तो रख!
उछल के गगन को छू ले तू!
घनघोर तमस से बाहर आ,
हो रोशनी से रु-ब-रु!
घूँट ग़मों का क्यूँ पीना?
सूर्य-किरण को पीले तू!
यूँ कतरा-कतरा क्या जीना?
जी-भर के ज़रा अब जीले तू!
और मैं?
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता जाऊँगा!
हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता जाऊँगा!
कभी ज़रूरत पड़े तो ज़रूर याद करना!
जब साया भी साथ छोड़ दे, शायद मैं ही काम आऊंगा!!
मगर.....सिर्फ़ एक दोस्त की हैसियत से!
